Devil की दास्तान - 41 Sonam Brijwasi દ્વારા પુષ્તક અને વાર્તા PDF

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Devil की दास्तान - 41

(रात का समय, सड़क पर आग के लपटें, बस जल रही है।
चारों ओर अफरा-तफरी है।
कबीर उर्फ़ करण ज़ॉम्बीज़ से घिरा हुआ है, पर उसकी आँखों में लाल चमक है, चेहरे पर गुस्सा और डर दोनों हैं।)

कबीर (गुस्से में चिल्लाकर) बोला - 
“आओ!! जितने भी हो, सब आ जाओ!!”

(वो हवा में उछलता है, उसके हाथों से काले धुएँ जैसी लपटें निकलती हैं जो कुछ ज़ॉम्बीज़ को राख बना देती हैं।
बाकी ज़ॉम्बीज़ चीखते हुए पीछे हटते हैं।)
(तभी सिया उर्फ़ सिमरन पीछे से चीखती है।)

सिया (डर से) बोली - 
“कबीर जी!!! बचाओ!!”

(कबीर मुड़कर देखता है — तीन ज़ॉम्बी सिया को पकड़ चुके हैं, उनमें से एक उसके हाथ में तेज़ी से दाँत गड़ा देता है।)

सिया (दर्द से चीखते हुए) बोली - 
“आआआह्ह्ह्ह!!!”

(कबीर की आँखें खून की तरह लाल हो जाती हैं। वो ज़मीन पर गिरते हुए सिया की ओर झपटता है।
हवा का तूफ़ान उठता है — ज़ॉम्बीज़ उसके आस-पास फेंक दिए जाते हैं।)

कबीर (गुस्से में गरजकर) बोला - 
“किसी ने हिम्मत कैसे की… मेरी सिया को छूने की!”

(वो सबको जला देता है, फिर सिया को गोद में उठाकर हवा में उड़ जाता है।)

(चाँदनी रात, एक खुला मैदान। चारों तरफ सन्नाटा। सिया की साँसें भारी हैं। उसका चेहरा पीला पड़ गया है, हाथ से खून बह रहा है।)

सिया (कमज़ोर आवाज़ में) बोली - 
“कबीर जी… मुझे बहुत दर्द हो रहा है…”

(कबीर जल्दी से उसे ज़मीन पर बिठाता है, उसके हाथ से चूड़ियाँ निकालता है।
उसकी आँखों में चिंता है, पर चेहरा अब भी शांत दिखाने की कोशिश कर रहा है।)

कबीर (धीरे, गंभीर आवाज़ में) बोला - 
“शांत रहो सिया… मैं यहाँ हूँ… कुछ नहीं होगा तुम्हें…।”

(वो उसके हाथ को ध्यान से देखता है — काटने की जगह काली पड़ चुकी है, नसों में नीला ज़हर फैलने लगा है।)

कबीर (बुदबुदाते हुए) बोला - 
“नहीं… अगर ये ज़ॉम्बी का ज़हर पूरी नसों में फैल गया, तो ये भी… ये भी उनमें से एक बन जाएगी…।”

(सिया उसकी आँखों में देखती है, उसकी साँसें टूट रही हैं।)

सिया (धीरे से) बोली - 
“अगर मैं… मर गई तो?”

कबीर (आँखें बंद कर, दुख में) बोला - 
“तुम मर नहीं सकती… तुम मेरी रूह का हिस्सा हो…”

(वो उसके हाथ को कसकर पकड़ता है और अपनी उँगली से ज़ख्म के पास एक गहरा निशान बनाता है।
उसके खून की कुछ बूँदें सिया के घाव में गिरती हैं। ज़मीन पर अजीब सी लाल रोशनी फैलती है।)

सिया (दर्द में चिल्लाते हुए) बोली - 
“आआआआह्ह्ह्ह्ह!!!”

(वो काँपती है, उसका शरीर कुछ पल के लिए हवा में उठता है, फिर ज़मीन पर गिर जाता है।
कबीर उसे अपनी बाँहों में लेता है।)
.(वही सुनसान मैदान। रात गहरी हो चुकी है। आसमान में बादल हैं, बिजली चमक रही है।
सिया ज़मीन पर पड़ी काँप रही है, उसका चेहरा पसीने से भीगा है, आँखों की पुतलियाँ धीरे-धीरे लाल पड़ रही हैं।)

कबीर (घबराकर) बोला - 
“सिया… सिया मेरी बात सुनो… आँखें खोलो!”

(वो उसके चेहरे पर पानी छिड़कता है। सिया की आँखें खुलती हैं, पर अब उनमें हल्की लाल चमक झलक रही है।)

सिया (कमज़ोर आवाज़ में, रोते हुए) बोली - 
“कबीर जी… बहुत दर्द हो रहा है… मेरे अंदर कुछ… कुछ जल रहा है…”

(कबीर उसके हाथ को पकड़ता है — ज़ॉम्बी के काटने की जगह अब काली नसों से ढक चुकी है जो ऊपर तक फैल रही हैं।)

कबीर (धीरे से, खुद से बुदबुदाते हुए) बोला - 
“नहीं… ये मुमकिन नहीं… मैंने अपने खून से इसे ठीक किया था… फिर भी…”

(वो गुस्से में अपनी मुट्ठी कसता है, आँखों में लाल चमक फैल जाती है।)

कबीर (चीखते हुए) बोला - 
“तू मुझसे कुछ छीन नहीं सकता, ज़हर! तू मेरी सिया को नहीं ले सकता!”

(लेकिन सिया का शरीर अब काँपने लगता है। उसकी साँसें भारी हो रही हैं। धीरे-धीरे उसके दाँत नुकीले दिखने लगते हैं, और वो शिकार भरी आंखों से कबीर को देखने लगती है।)

सिया (धीरे, अजीब आवाज़ में) बोली - 
“ख़ून… मुझे… ख़ून चाहिए…।”

(कबीर पीछे हटता है, उसके चेहरे पर दर्द और डर दोनों झलकते हैं।)

कबीर (धीरे से) बोला - 
“नहीं सिया… तुम्हे मैं नहीं खो सकता… तुम ज़िंदा हो… मेरी सिया ज़िंदा है…”

(सिया अचानक झपटती है — उसके हाथ कबीर के कंधे पर। वो दाँत गड़ाने ही वाली होती है कि कबीर उसका चेहरा पकड़ लेता है।)

कबीर (जोर लगाकर) बोला - 
“रुक जाओ!! ये तुम नहीं हो! ये तुम्हारे अंदर का ज़हर है!!”

(सिया ज़ोर से छटपटाती है, उसकी चीखें पूरे जंगल में गूँज उठती हैं।)

सिया (टूटी आवाज़ में) बोली - 
“म…मुझे बचा लो… कबीर जी…”

(कबीर काँपते हुए अपनी जेब से एक काला कपड़ा निकालता है। वो सिया को कसकर पकड़ता है, और उसके मुँह पर वो कपड़ा बाँध देता है ताकि वो उसे काट न सके।)

कबीर (धीरे से, आँसू रोकते हुए) बोला - 
“मुझे माफ़ कर देना… मैं तुम्हें ऐसे नहीं देख सकता…।”

(सिया का शरीर थरथराता है। वो ज़ोर से बाँहें हिलाती है, पर कबीर उसे अपने सीने से लगा लेता है।
उसके चेहरे पर आँसू नहीं हैं… क्योंकि वो रो नहीं सकता — वो शैतान है।)

कबीर (टूटे हुए स्वर में, खुद से) बोला - 
“काश… मैं इंसान होता… तो तुम्हारे लिए रो पाता, सिया…।”

(सिया धीरे-धीरे शांत हो जाती है। उसकी साँसें अभी चल रही हैं, पर आँखों में अब भी नीली चमक है।
कबीर उसकी माथे पर हाथ रखता है, और आसमान की ओर देखता है।)

कबीर (धीरे से) बोला - 
“तुम्हारे अंदर अब मौत और मेरा खून… दोनों हैं।
देखते हैं… कौन जीतेगा।”

( चाँद पर काले बादल छा जाते हैं। हवा तेज़ चलने लगती है।
सिया की आँखें खुलती हैं — आधी इंसान, आधी ज़ॉम्बी बन चुकी।)