अनकही - 5 Dewy Rose દ્વારા પુષ્તક અને વાર્તા PDF

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अनकही - 5






मेहरीश ने चाबी को अपने बैग में रखा और पूरा दिन सोचती रही। हर बार जब वह कंप्यूटर स्क्रीन देखती, तो उसकी नज़र बैग पर चली जाती। वह चाबी सिर्फ धातु का टुकड़ा नहीं थी, वह एक चुनाव थी। एक दुनिया में कदम रखने का निमंत्रण जो उसकी अपनी दुनिया से कोसों दूर थी।

शाम को घर लौटते हुए उसने रयान को मैसेज किया: "मुझे एक दिन और चाहिए।"

रिप्लाई तुरंत आया: "टेक ऑल द टाइम यू नीड। आई विल वेट।"

उस रात मेहरीश ने अपनी माँ की तस्वीर के सामने बैठकर बात की, जैसे वह हमेशा करती थी जब उसे कोई बड़ा फैसला लेना होता।

"माँ, एक आदमी है... वह अच्छा है। पर वह बहुत अमीर है। बहुत पावरफुल। मुझे डर है। डर है कि मैं उसकी दुनिया में फिट नहीं बैठूँगी। डर है कि लोग क्या कहेंगे। डर है कि यह सब एक गलती है।"

तस्वीर में उसकी माँ मुस्कुरा रही थी। हमेशा की तरह।

"पर माँ... जब मैं उसके साथ होती हूँ, तो मैं खुद को समझ पाती हूँ। शायद पहली बार। वह मुझे बिना बोले समझता है। और मैं उसे।"

आँखों में आँसू आ गए।

"क्या मैं यह रिस्क लूँ? या सुरक्षित रहूँ? तुम क्या करती अगर तुम मेरी जगह होती?"

कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ साइलेंस। और उस साइलेंस में मेहरीश को जवाब मिल गया।

अगली सुबह उसने मिस्टर शर्मा से कहा: "मैं मल्होत्रा एंटरप्राइजेज़ की टीम में ज्वाइन करूँगी।"

मिस्टर शर्मा खुशी से उछल पड़े। "शाबाश! यह तुम्हारे लिए बहुत बड़ा अवसर है!"

पर मेहरीश जानती थी, यह सिर्फ करियर का अवसर नहीं था। यह रयान के करीब जाने का रास्ता था।

दोपहर में उसे मल्होत्रा एंटरप्राइजेज़ के एचआर से कॉल आया। "मिस सक्सेना, आपका वेलकम किट तैयार है। कल सुबह 9 बजे 50वीं मंज़िल पर रिपोर्ट करें।"

50वीं मंज़िल। वह चाबी वाली मंज़िल।

उस रात मेहरीश ने अपने सबसे अच्छे कपड़े निकाले। एक साधारण ब्लू सलवार सूट। परफेक्टली आयरन किया हुआ। उसने सोचा, "क्या यह काफी होगा? उस दुनिया के लिए?"

फोन बजा। नीता का कॉल।

"सुन! मैंने सुना तू मल्होत्रा एंटरप्राइजेज़ ज्वाइन कर रही है! यह तो बहुत बड़ी बात है!"

"हाँ... पर मुझे डर लग रहा है नीता।"

"डर? क्यों? यह तो ड्रीम जॉब है!"

"पर... रयान मल्होत्रा..."

"अरे हाँ! वो तो बहुत हॉट है! पर सावधान रहना... मैंने सुना है वो बहुत मुश्किल बॉस है। गुस्सैल। टेम्पर वाला।"

मेहरीश ने सोचा, उसने वह रयान नहीं देखा था। उसने सिर्फ मीडिया वाला रयान देखा था। असली रयान... वह तो अलग था।

"थैंक्स नीता। मैं सावधान रहूँगी।"

सुबह 8:30 बजे। मल्होत्रा एंटरप्राइजेज़ की इमारत के सामने। काँच और स्टील का बना यह टावर आसमान को छू रहा था। मेहरीश ने गहरी साँस ली। और अंदर कदम रखा।

लॉबी बिल्कुल वैसी थी जैसी फिल्मों में दिखती है। संगमरमर के फर्श। ऊँची छत। लोग महंगे सूट्स में तेज कदमों से चल रहे थे। सब व्यस्त। सब इम्पोर्टेन्ट।

उसने रिसेप्शन पर अपना नाम बताया। रिसेप्शनिस्ट ने उसे एक आईडी कार्ड दिया। "50वीं मंज़िल। लिफ्ट बी।"

लिफ्ट में चढ़ते हुए उसका दिल धड़क रहा था। 50वीं मंज़िल। उसने कभी इतनी ऊँचाई पर नहीं जाना था।

लिफ्ट का दरवाज़ा खुला। और वह एक और दुनिया में थी।

यह मंज़िल बिल्कुल अलग थी। शांत। साफ। मिनिमल। फर्श पर सफेद मार्बल। दीवारों पर एब्स्ट्रैक्ट आर्ट। हर चीज़ परफेक्ट थी। टू-पर्सेंट-बाय-टू-पर्सेंट।

एक यंग वुमन उसकी तरफ आई। "मिस सक्सेना? मैं छाया हूँ। मिस्टर मल्होत्रा की एग्जीक्यूटिव असिस्टेंट। मैं आपको आपके ऑफिस दिखाऊँगी।"

छाया उसे एक कॉरिडोर में ले गई। कॉरिडोर के अंत में एक बड़ा दरवाज़ा था। रयान का ऑफिस।

"यहाँ सब कुछ थोड़ा डिफरेंट है," छाया ने कही। "मिस्टर मल्होत्रा को साइलेंस पसंद है। नो अननैसरी नॉइज। नो आउट ऑफ़ टर्न बातें। सब कुछ प्रोफेशनल।"

"ठीक है।"

"और... यह जान लीजिए। वो बहुत स्ट्रिक्ट हैं। एक गलती और आप आउट।"

मेहरीश ने सिर हिलाया। पर उसके मन में एक सवाल था, क्या यह वही रयान है जिसने उसे सफेद पत्थर दिया था?

उसका ऑफिस छोटा था, पर ब्यूटीफुल। खिड़की से पूरा शहर दिख रहा था। उसने सोचा, "यहाँ से दुनिया कितनी छोटी लगती होगी।"

तभी छाया ने कहा, "मिस्टर मल्होत्रा आपसे 10 मिनट में मिलना चाहते हैं। उनके ऑफिस में।"

"ठीक है।"

10 मिनट बाद मेहरीश रयान के ऑफिस के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने दरवाज़ा खटखटाया।

"अंदर आइए।"

रयान का ऑफिस और भी बड़ा था। एक विशाल डेस्क। बुकशेल्फ़। और एक पूरी दीवार जो खिड़की थी। रयान डेस्क पर बैठा था, कुछ दस्तावेज़ पढ़ रहा था।

उसने ऊपर देखा। उसकी आँखों में वह प्रोफेशनल एक्सप्रेशन था। "मिस सक्सेना। बैठिए।"

मेहरीश बैठ गई।

"आपके जॉइनिंग के बारे में कुछ बातें हैं। यह प्रोजेक्ट बहुत इम्पोर्टेन्ट है। हमें पूरा फोकस चाहिए। पूरी डेडिकेशन।"

"जी।"

"और... यहाँ हम प्रोफेशनल रहते हैं। नो पर्सनल मैटर्स। नो डिस्ट्रेक्शन। क्लियर?"

मेहरीश ने देखा, उसकी आँखें कह रही थीं कुछ और। "क्लियर।"

"अच्छा। आपकी फर्स्ट टास्क यह है..." रयान ने एक फाइल आगे बढ़ाई।

पर तभी उसका इंटरकॉम बजा। आर्या की आवाज़: "सर, आपके पापा हैं।"

दरवाज़ा खुला। और विजय मल्होत्रा अंदर आए।

मेहरीश ने पहली बार उन्हें करीब से देखा। वह मीडिया वाले फोटो से भी ज्यादा इंटिमिडेटिंग थे। उनकी नज़रें तेज थीं। चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं।

"रयान, मुझे बात करनी है।" उनकी आवाज़ में अधिकार था।

"पापा, यह मेहरीश सक्सेना हैं। हमारी नई मार्केटिंग एक्सपर्ट।"

विजय मल्होत्रा ने मेहरीश को देखा। एक सेकंड के लिए। फिर अनदेखा कर दिया। "तुम्हारी मीटिंग खत्म करो। मैं बाहर इंतज़ार करता हूँ।"

वह चले गए। पर उस एक सेकंड की नज़र ने मेहरीश को डरा दिया। वह नज़र... वह जजमेंटल थी। डिसमिसिव।

दरवाज़ा बंद हुआ। रयान ने गहरी साँस ली। फिर बोला, बहुत धीमे: "सॉरी।"

"कोई बात नहीं।"

"नहीं... मैं सॉरी कह रहा हूँ उस लुक के लिए जो मेरे पिता ने तुम्हें दिया।"

मेहरीश ने सिर हिलाया। "मैं समझती हूँ।"

"नहीं... तुम नहीं समझती। पर एक दिन समझोगी।"

उसने फाइल आगे बढ़ाई। "यह लो। अपना काम शुरू करो। और... वेलकम टू द मल्होत्रा वर्ल्ड।"

मेहरीश ने फाइल ली। और बाहर आ गई।

उसके बाद के घंटे बहुत हेवी थे। नए सिस्टम। नए लोग। नए रूल्स। सब कुछ इतना परफेक्ट था कि डरावना था।

लंच टाइम में वह कैफेटेरिया गई। लोग उसे देख रहे थे। व्हिस्परिंग। "यह नई लड़की कौन है?" "इसे सीधा रयान के ऑफिस में रखा गया है।" "शायद कोई रिलेशन है।"

मेहरीश ने सब सुना। पर चुप रही। वह एक कोने में बैठकर खाना खाने लगी।

तभी छाया आई। "मिस सक्सेना, मिस्टर मल्होत्रा ने आपको बुलाया है। उनके पर्सनल ऑफिस में।"

"पर्सनल ऑफिस?"

"हाँ। 50वीं मंज़िल पर ही है। मैं आपको ले चलती हूँ।"

छाया उसे एक प्राइवेट लिफ्ट में ले गई। यह लिफ्ट सिर्फ एक ही मंज़िल पर जाती थी, रयान के पर्सनल स्पेस पर।

लिफ्ट का दरवाज़ा खुला। और मेहरीश की साँस रुक गई।

यह ऑफिस नहीं था। यह एक होम था। एक पेंटहाउस। खुला स्पेस। फ्लोर-टू-सीलिंग विंडोज़। पूरा शहर नीचे दिख रहा था।

रयान खिड़की के पास खड़ा था। उसने मुड़कर देखा। और अब उसकी आँखों में वही नर्मी थी जो मेहरीश जानती थी।

"वेलकम," उसने कहा। "मेरी असली दुनिया में।"

"यह... यह तुम्हारा ऑफिस है?"

"नहीं। यह मेरा एस्केप है। जहाँ मैं वो नहीं होता जो मुझे होना चाहिए। जहाँ मैं सिर्फ रयान होता हूँ।"

उसने एक चाबी निकाली। वही चाबी जो मेहरीश के पास थी। "तुम्हारे पास भी यही चाबी है। तुम कभी भी आ सकती हो। जब भी तुम्हें ज़रूरत हो।"

"पर... छाया ने कहा..."

छाया को नहीं पता यह जगह किसलिए है। किसी को नहीं पता। सिर्फ तुम और मैं।"

रयान ने करीब आकर कहा, "मैंने तुमसे कहा था ना, हम प्रोफेशनल रहेंगे। पर यहाँ नहीं। यहाँ... यहाँ हम वो हैं जो साइलेंट रिट्रीट में थे।"

मेहरीश ने देखा कि इस रूम में कोई डेस्क नहीं थी। कोई कंप्यूटर नहीं। सिर्फ किताबें। म्यूजिक। आर्ट। और एक ग्रे पियानो।

"तुम पियानो बजाते हो?"

"मैं कोशिश करता हूँ। जब बहुत ज्यादा गुस्सा आता है। जब शब्द नहीं आते। तब म्यूजिक आता है।"

"क्या मैं सुन सकती हूँ?"

रयान ने सिर हिलाया। पियानो के पास बैठा। और बजाना शुरू किया।

वह संगीत... वह ब्यूटीफुल था। दुखद। गहरा। मेहरीश बंद आँखों से सुनने लगी। और उस संगीत में उसे रयान का सारा दर्द सुनाई दिया। उसका अकेलापन। उसकी तड़प।

जब संगीत खत्म हुआ, तो मेहरीश की आँखें खुलीं। और वह रो पड़ी।

"क्या हुआ?" रयान ने पूछा।

"तुम्हारा दर्द... मैंने उसे सुना। तुम्हारे संगीत में।"

रयान मुस्कुराया। एक दुखभरी मुस्कान। "तुम पहली इंसान हो जिसने सुना।"

उसने मेहरीश के करीब आकर कहा, "मैं तुम्हारे आने का इंतज़ार कर रहा था। यह जगह... यह तुम्हारे लिए बनी है। तुम्हारी शांति के लिए। तुम्हारी खामोशी के लिए।"

"पर मैं... मैं यहाँ फिट नहीं बैठती। यह सब बहुत... बहुत है।"

"तुम फिट बैठती हो। क्योंकि तुम इसकी चमक में नहीं, इसकी खामोशी में फिट बैठती हो।"

रयान ने उसका हाथ पकड़ा। "मेहरीश... मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ।"

"क्या?"

"क्या तुम मेरे साथ रह सकती हो? इस दुनिया में? इन दो दुनियाओं के बीच? मेरे पिता के प्रेशर और मेरी इच्छाओं के बीच?"

मेहरीश ने देखा, उसकी आँखों में डर था। असली डर। खो देने का डर।

"रयान... यह बहुत फास्ट है।"

"मुझे पता है। पर जब मैं तुम्हारे साथ होता हूँ, तो सब कुछ रुक जाता है। टाइम। प्रेशर। सब।"

"मैं... मुझे सोचने दो।"

"ओके। सोचो। पर याद रखना, मैं यहाँ हूँ। हमेशा।"

शाम को जब मेहरीश वापस अपने ऑफिस आई, तो उसने देखा कि उसकी टेबल पर एक छोटा सा नोट रखा हुआ है। रयान की हैंडराइटिंग में।

"आज शाम 7 बजे। नीचे गेराज में। मैं तुम्हें घर छोड़ने आऊँगा। प्लीज आओ।"

मेहरीश ने सोचा। फिर उसने अपना सामान पैक किया। 7 बजे वह गेराज में थी।

रयान की कार आई। वह अंदर बैठ गई।

कार चली। पहले कुछ मिनट साइलेंस। फिर रयान बोला, "मेरे पापा... उन्होंने तुम्हारे बारे में पूछा।"

"क्या पूछा?"

"तुम कौन हो। तुम क्यों यहाँ हो। मैंने कहा, तुम बेस्ट हो। प्रोफेशनली।"

"और उन्होंने मान लिया?"

"नहीं। उन्होंने कहा,  एक लड़की जो तुम्हारे ऑफिस में सीधी हायर हुई है... यह जस्ट ए कॉइनसिडेंस नहीं है।"

मेहरीश ने महसूस किया, खतरा शुरू हो चुका था।

"वो जानना चाहते हैं कि तुम कौन हो। और मैं... मैं नहीं चाहता कि वो तुम्हारे बारे में जानें। मेरे पिता... वो बहुत क्रूर हो सकते हैं।"

"क्या करेंगे वो?"

"मुझे नहीं पता। पर मैं तुम्हें सेफ रखूँगा। प्रॉमिस।"

गाड़ी मेहरीश के घर के सामने रुकी। रयान ने उसकी तरफ देखा। "कल... कल तुम्हारा पहला प्रेजेंटेशन है बोर्ड के सामने। मेरे पापा भी होंगे। तैयार रहना।"

"मैं तैयार हूँ।"

"नहीं... तुम नहीं समझ रही। यह सिर्फ प्रेजेंटेशन नहीं है। यह एक टेस्ट है। तुम्हारा और मेरा।"

"क्या मतलब?"

"मेरे पिता तुम्हें टेस्ट करेंगे। देखेंगे कि तुम कितनी स्ट्रॉन्ग हो। कितनी प्रोफेशनल। और... क्या तुम मेरे लिए डिस्ट्रेक्शन हो।"

मेहरीश की साँस फूल गई। "तो मुझे परफेक्ट होना होगा।"

"हाँ। पर याद रखना, कोई फर्क नहीं पड़ता कल क्या होगा। मैं तुम्हारे साथ हूँ। हमेशा।"

मेहरीश कार से उतरी। पर मुड़कर बोली, "रयान... एक बात।"

"हाँ?"

"वो पियानो वाला रूम... वह बहुत खूबसूरत है। थैंक यू। मुझे वहाँ ले जाने के लिए।"

रयान मुस्कुराया। "यह तुम्हारा है। हमेशा के लिए।"

वह चली गई। रयान ने देखा कि वह अंदर जाती है। फिर उसने अपना फोन निकाला। एक मैसेज: "पापा, कल की मीटिंग के बारे में। मैं चाहता हूँ कि आप मेहरीश को फेयर चांस दें।"

रिप्लाई आया तुरंत: "हर किसी को फेयर चांस मिलता है। पर रिमेंबर, वी आर मल्होत्राज़। वी डोंट मेक मिस्टेक्स।"

रयान ने फोन बंद किया। और एक लंबी, गहरी साँस ली। कल का दिन... वह सब कुछ बदल सकता था।

उधर मेहरीश ने अपने घर में प्रेजेंटेशन की प्रैक्टिस शुरू कर दी। वह जानती थी,  कल सिर्फ उसका करियर नहीं, बल्कि उसका और रयान का रिश्ता भी दाँव पर लगा था।

रात को सोते समय उसने सफेद पत्थर को हाथ में लिया। और प्रार्थना की: "माँ, मेरी मदद करना। मुझे स्ट्रॉन्ग रहना है। कल के लिए। रयान के लिए। हमारे लिए।"

°°°°°

अगली सुबह, मेहरीश जब ऑफिस पहुँची, तो छाया ने उसे एक एन्वलप दिया। "मिस्टर विजय मल्होत्रा की तरफ से।"

मेहरीश ने खोला। अंदर था, एक सिंगल पेज। उस पर लिखा था: "मिस सक्सेना। कल की मीटिंग से पहले मैं आपसे मिलना चाहता हूँ। मेरे ऑफिस में। 9 बजे। अकेले।"

और नीचे साइन: "विजय मल्होत्रा।"

मेहरीश का दिल ज़ोर से धड़का। विजय मल्होत्रा खुद उससे मिलना चाहते थे। प्रेजेंटेशन से पहले। यह अच्छा नहीं था। यह एक चेतावनी थी। एक चुनौती थी।

उसने अपना फोन निकाला। रयान को मैसेज करना चाहती थी। पर फिर रुक गई। नहीं। उसे खुद ही इसका सामना करना था।

उसने घड़ी देखी। 8:45 बजे। 15 मिनट। फिर वह विजय मल्होत्रा के सामने होगी। अकेली।

उसने गहरी साँस ली। और विजय मल्होत्रा के ऑफिस की तरफ चल पड़ी...