ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्याऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत ...
ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या--"मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१भावार्थ --हमारे अन्दर कंजूसी न हो।पद विच्छेद --मान्तः — भीतर, अन्तर मेंस्थूः/स्थुर्नः — ...
ऋगुवेद सूक्ति--(35) की व्याख्या"स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भाव--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (१०) की व्याख्या“न रिष्यते त्वावतः सखा” — (जो ईश्वर का सखा/भक्त है वह नष्ट नहीं होता) —इस ...
ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्याऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत ...
ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या"मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१भावार्थ --हमारे अन्दर कंजूसी न हो।पद विच्छेद --मान्तः — भीतर, अन्तर मेंस्थूः/स्थुर्नः — ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (58) की व्याख्याप्रियं वद्।ऋगुवेद --8/89/3अर्थ--प्रिय बोलो।ऋग्वेद 8.89.3 का पूरा मंत्र इन्द्र स्तुति से संबंधित है।ऋग्वेद 8.89.3मूल मंत्र“प्रियं ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (57) की व्याख्याएकं सद्विप्रा; बहुधा वदन्ति।ऋगुवेद --1/164/46अर्थ --ईश्वर एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।यह ...
ऋगुवेद सूक्ति--(३५) की व्याख्या"स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भावार्थ--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् ...
ऋगुवेद सूक्ति--(51)की व्याख्या“नव्यो नव्यो भवति” (ऋग्वेद-- 1/31/8)का भाव बहुत प्रेरणादायक और गहन है।शब्दार्थ:--नव्यो नव्यः = बार-बार नया, सदैव नवीनभवति ...