zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

आधुनिक तकनीकों से
अब हम भ्रुण का चुनाव करते है
वंशिका को मारकर हम वंश का बचाव करते है..
चलो ये अच्छा ही है
किसी जीवन को यूं सड़क पर,
नोचने के लिए फेंक देने से,
पर जो देखा नही उसे नोचा भी गया..
काटा भी गया..
बस उसकी चीखे हमें सुनाई नही दी..
क्योंकि हमने ही तो उसकी आवाज
निकलने से पहले ही बंद कर दी..
नही नही हम कोई हत्यारे नही है,
हम आधुनिक है..

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हां वादे भी नहीं थे बातें नहीं थी..
ऐसा भी नहीं है कि मोहब्बत नहीं थी..
इज़हार था, इकरार था,
ऐतबार था, तक़रार था,
हजारों शिकायतों में बंद प्यार भी था,
दरम्यां तो सब था हमारे पर
हमनवाई नहीं थी.
ऐसा भी नहीं है कि मोहब्बत नहीं थी..
जरूरत तक ही नहीं कुछ जरूरी सिलसिले थे,
यकीन नहीं होता कभी हम मिले थे
कुछ तुम दर्द में थे,
कुछ हमें भी गिले थे..

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तुमसे ही रूठकर तुम्हे ही याद करते हैं..
भोलेनाथ हमें तो ठीक से नाराज होना भी नहीं आता..
जै भोलेनाथ..🙏

दूरियों ने ही कायम रखा है इश्क़ को..
वरना नजदीकियां तो अक्सर फासले बढ़ाती हैं..

चलो चले कहीं
पहचान बदल कर...
किसी अंजान राहों में...
किसी अंजान शहर में...
घण्टों घूमते रहे अंजान गलियों में...
जहां हम हो तुम हो
और हमारी चाय के अलावा कोई ना हो।
चलो चले इस आसमा से परे..
जहां तुम हो इश्क़ हो,
हर वक़्त तुम्हे सोचूँ ,
तुम्हारे लिए ही जियूँ,
बस जाऊं तुममे कही,
जहां सिर्फ हम हो..
और हममें हमारा सारा जहाँ हो..
चलो चले इस शहर से दूर कहीं..
किसी अनजान सफर में..

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भटकता रहा मन दर-बदर
पर कहीं बसेरा ना हुआ..
मुद्दतों तरसते रहे रौशनी के लिए,
अंधेरा छाया ही रहा, पर सवेरा ना हुआ..
खुशियां भी आयी कभी पल-दो-पल के लिए..
वक्त ठहरा तो सही पर मेरा ना हुआ..

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बीत जाएंगे ये दिन भी,
और बदल जायेगा वक़्त भी..
धूमिल होंगे कई रिश्ते,
उम्मीदों के तूफान में..
मुरझा जाएंगी कई यादें,
वक़्त की दोपहर में..
एक दिन खत्म होंगे हम भी,
जैसे पतझड़ में सूखे पत्ते गिरते हैं..
और मिट्टी में मिल जाते हैं..
या कोई हवा उड़ा ले जाएगी,
और छोड़ देगी किसी देहलीज पर,
अनजानों के बीच अंजाने सफर में..
फिर से मिटने के लिए....

#रिश्ता

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किसी को मेरी कमी भी खली होगी,
किसी को मैं याद भी नही आई हूंगी..
कोई बहुत रोया होगा मेरे ज़नाज़े पर,
किसी ने खुशियां भी मनाई होंगी..

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"सिर्फ तुम.." by Sarita Sharma read free on Matrubharti
https://www.matrubharti.com/book/19880924/sirf-tum

उलझी सी मन की डोर,
अनसुलझी सी कुछ बातें..
दिल की बन्द तह में,
भूली हुई सी यादें..
बातों की हंसी ठिठोली में,
खट्टी मीठी तक़रार..
कायम रहा जो दूरियों में भी,
वो बेपनाह सा प्यार..
खोज रहा है आज मन,
पहलू दर पहलू...

#पहलू

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