zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

कुछ ख़्वाब जो अब छोड़ दिये मैंने,
कुछ हकीकत को अपना लिया..
कुछ आदतें जो अब नहीं रही,
कुछ जरूरतें जो पूरा करती हूं..
कुछ मनमर्जियां जो अब नहीं करती,
कुछ ज़िम्मेदारियां जो निभाना सीख लिया..
कुछ अपनो की अपनी ना हो सकी,
तो कुछ गैरों को अपना लिया..
एक ज़िन्दगी जो जीनी छोड़ दी मैंने,
एक उम्र जिसे गुजार दिया..

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तिल तिल के मरना हर रोज़.. मर मर के जीना..
यूंही किसी याद के साथ जीते चले जाना..

ऐ जाते हुए साल
जाते-जाते,
सबके जीवन से,
दुख, तकलीफें,
और परेशानियां..
भी लेते जाना,
और
देते जाना,
सुकून भरी ऐसी ख़ुशी..
जो खत्म ना हो क़भी..
बढ़ती ही जाए
साल दर साल..😊

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लिख तो देंगे दर्द का हिसाब बेहिसाब..
पर महसूस कर सकें वो एहसास कहां..

कुछ भावनाएं जो लफ्जों में बयां नहीं हो सकती.
उन्हें कागजों में बिखेरने की कोशिश करती हूं.
वो उदासी जो मेरी हंसी से छलक जाती है..
उन्हें इन अल्फाजों में समेटने की कोशिश करती हूं..

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भोलेनाथ शंकरा
आदि देव शंकरा
तेरे जाप के बिना
चले ये सांसे किस तरह
तेरे नाम की ज्योत ने हर लिया तमस मेरा..
जै शिवाय शंकरा.. भोलेनाथ शंकरा...

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आदत-ए-शख़्सियत ऐसी हो गयी है..
जीने के लिए दर्द, अब जरूरी सा लगता है...

थकी हुई होने पर उसे थकी हूं कहने का अधिकार नही है
बीमार होने पर उसे आराम करने का अधिकार नही है
मन होने पर उसे देर से उठने का अधिकार नहीं है
अपनी मर्ज़ी से बाहर अकेले घूमने का अधिकार नही है
अपने घर की मैं अपनी ना हो सकी
और पराए घर ने अपना ना सका
हां मै अपराधी हूं,
हां मैं लड़की हूं..

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