बाद मुद्दत उसे देखा, लोगों
वह जरा भी नहीं बदला, लोगों

खुश न था हमसे बिछड़ कर वह भी
उसके चेहरे पर लिखा था, लोगों

उसकी आंखें भी कहे देती थी
रात भर वह भी न सोया, लोगों

अजनबी बनकर जो गुजरा है अभी
था किसी वक्त में अपना, लोगों

दोस्त तो खैर कोई किसका है
उसने दुश्मन भी न समझा, लोगों

रात वह दर्द मेरे दिल में उठा
सुबह तक चैन न आया, लोगों

प्यास सहाराऔं की फिर तेज हुई
अबर फिर टूट के बरसा, लोगों

good morning

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कभी मिलने चले आओ
बड़ा वीरान मौसम है कभी मिलने चले आओ
हर एक जानीब तेरा गम है कभी मिलने चले आओ

हमारा दिल किसी गहरी जुदाई के भंवर में हैं
हमारी आंखें भी नम हैं कभी मिलने चले आओ

मेरे हमराह गर चे दूर तक लोगों की रौनक है
मगर जैसे कोई कम है कभी मिलने चले आओ

तुम्हें तो खबर है मेरे ज़ख्मी दिल के जख्मों की
तुम्हारा मेलाप मरहम है कभी मिलने चले आओ

अंधेरी रात की गहरी खमोशि और तन्हा दिल
दिए कि लौ भी मद्धम है कभी मिलने चले आओ

तुम्हारे रूठ के जाने से हमको ऐसा लगता है
मुकद्दर हमसे बरहम हैं कभी मिलने चले आओ

हवाओं और फूलों की नई खुशबू बताती है
तेरे आने का मौसम है कभी मिलने चले आओ
_________

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वक्त और समय बहुत कीमती है ,
उसकी कीमत समझना हो
तो अखबार से समझें!
जो सुबह में ₹5 का एक होता है
और शाम में वही अखबार
₹5 किलो बिकता है।

good evening

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मिल गई आपको फुर्सत कैसे
याद आई मेरी सूरत कैसे

पूछ उनसे जो बिछड़ जाते हैं
टूट पड़ती है कयामत कैसे

तेरी खातिर तो यह आंखें पाईं
मैं भुला दूं तेरी सूरत कैसे

अब तो सब कुछ ही मुयस्सर है उसे
अब उसे मेरी जरूरत कैसे

तुझ से अब कोई ताल्लुक ही नहीं
तुझ से अब कोई शिकायत ही नहीं

काश हम को भी बता दे कोई
लोग करते हैं मोहब्बत कैसे

तेरे दिल में मेरी यादें तड़पे
इतनी अच्छी मेरी किस्मत कैसे

वह तो खुद अपनी तमन्ना है हादी
उसके दिल में कोई चाहत कैसे
🌅
good morning
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टूट जाए न भरम होंट हिलाऊं कैसे
हाल जैसा भी है लोगों को सुनाओ कैसे

खुश्क आंखों से भी अश्कों की महक आती है
मैं तेरे गम को जमाने से छुपाऊं कैसे

तेरी सूरत ही मेरी आंख का सरमाया है
तेरे चेहरे से निगाहों को हटाऊं कैसे

तू ही बतला मेरी यादों को भुलाने वाले
मैं तेरी याद को इस दिल से बुलाऊं कैसे

फूल होता तो तेरे दर पर सजा भी रहता
जख्म लेकर तेरी दहलीज पे आऊं कैसे

आईना मांद पड़े सांस भी लेने से
इतना नाजुक हो ताल्लुक तो निभाऊं कैसे

वो रुलाता है रुलाए मुझे जी भर अदीम
मेॆरी आंखें हैं वह, मैं उसको रूलाऊं कैसे

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होठों पे मोहब्बत के फसाने नहीं आते
साहिल पे समुंदर के खजाने नहीं आते।

पलकें भी चमक उठी हैं सोते में हमारी
आंखों को अब सपने छुपाने भी नहीं आते।

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पं. मुकेश शास्त्री जी
और
पयगम्बर मुहम्मद साहब की शिक्षा

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वह है जान अब हर एक महफिल कि
हम भी अब घर से कम निकलते हैं

है उसे दूर का सफर दरपेश
हम संभाले नहीं संभल ते हैं

good night

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तेज बारिश में कभी सर्द हवाओं में रहा
एक तेरा जिक्र था जो मेरी सदाओं में रहा

कितने लोगों से मेरे गहरे मरासिम हैं मगर
तेरा चेहरा ही फकत मेरी दुआओं में रहा

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बनाने वाले ने अजीब वीडियो बनाएं
इसे क्या नाम दूं
मेरी समझ में तो कुछ नहीं आया

आप ही कोई नाम दे दे

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